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Wednesday, November 11, 2020

पूर्व सुरक्षा अफसरों की चिंता, ट्रम्प गुप्त सूचनाएं सार्वजनिक कर सकते हैं; बेच भी सकते हैं

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अमेरिका में जो बाइडेन ने भले ही निर्वाचित राष्ट्रपति के तौर पर देश को संबोधित भी कर लिया हो, लेकिन सत्ता का सस्पेंस आगे और बढ़ने वाला है। चुनाव में पिछड़ने के बावजूद ट्रम्प ने अब तक व्हाइट हाउस नहीं छोड़ा है। बल्कि, कुछ घटनाक्रम ऐसे शुरू हो गए हैं, जिनसे अमेरिका के पूर्व सुरक्षा अधिकारियों की चिंता बढ़ गई है। उन्हें डर है कि व्हाइट हाउस छोड़ने से पहले ट्रम्प गोपनीय सुरक्षा सूचनाएं सार्वजनिक न कर दें या कहीं वे उन्हें अपने व्यापार में फायदे के लिए बेच न दें।

ट्रम्प के पास बतौर राष्ट्रपति कई बेहद गोपनीय सूचनाएं हैं। इनमें परमाणु हथियारों की लॉन्चिंग, खुफिया सूचनाएं जुटाने की क्षमताएं, दूसरे देशों में अमेरिकी सामरिक ठिकानों से जुड़ी तमाम जानकारियां, अत्याधुनिक हथियार प्रणालियों के विकास की स्थिति आदि शामिल है। पूर्व अधिकारियों की मानें तो इन सूचनाओं के प्रति ट्रम्प का रवैया अब तक काफी गैरजिम्मेदार रहा है।

खुफिया एजेंसी सीआईए के पूर्व अफसर डेविड प्रिएस ने बताया- ‘कोई भी (राष्ट्रपति) जो नाराज, असंतुष्ट या व्यथित हो, उसके साथ इस तरह का जोखिम रहता है कि वह गोपनीय सूचनाएं सार्वजनिक कर सकता है। ट्रम्प के ऊपर करोड़ों डॉलर का कर्ज चढ़ चुका है, जिसकी वजह से वे काफी दबाव में हंै। इससे भी उनका असंतोष बढ़ रहा है।’

पूर्व खुफिया अधिकारी लैरी फाइफर और सीआईए महानिदेशक के स्टाफ में रह चुके माइकल वी हैडेन कहते हैं- ‘सुरक्षा और खुफिया अधिकारियों के लिए वे लोग (राष्ट्रपति या उनके साथ शीर्ष पद पर बैठे अन्य लोग) हमेशा चिंता का विषय रहते हैं, जिन पर कर्ज ज्यादा होता है।’

इसके अलावा सिलसिलेवार घटनाएं भी हैं, जो चिंताजनक संकेत दे रही हैं। मसलन- ये आम मान्यता है कि चुनाव हारने के व्हाइट हाउस में बैठे राष्ट्रपति की व्यस्तता स्वाभाविक तौर पर कम हो जाती है। लेकिन, ट्रम्प पहले से अधिक व्यस्त हैं।

वे व्हाइट हाउस छोड़ने काे राजी नहीं है। बल्कि, उन्होंने एक सप्ताह में अमेरिकी सैन्य मुख्यालय पेंटागन से कई बड़े अफसरों को हटाकर उनकी जगह वफादारों को बिठाया है। यहां तक कि रक्षा मंत्री को भी बदल दिया है। इस तरह वे प्रशासन पर अपनी पकड़ मजबूत कर रहे हैं।

वे व्हाइट हाउस से बाहर कहीं किसी कार्यक्रम में या सैर-सपाटे के लिए भी नहीं निकले हैं। दूसरी तरफ उनकी टीम धन जुटाने के अभियान में भी लगी है। संकेत साफ है कि आने वाले दिनों में सत्ता का एक नया संघर्ष शुरू होगा। इस बीच ट्रम्प को पेन्सिलवेनिया से एक झटका भी लगा है।

वहां डाक विभाग के एक कर्मचारी हॉपकिंस ने स्वीकार किया है कि उसने मेल-इन वोट (ईमेल के जरिए डाले गए वोट) के बारे में मनगढ़ंत आरोप लगाए थे। हॉपकिंस ने इसे पहले शपथ पत्र देकर मेल-इन वोटिंग में अनियमितताओं का आरोप लगाया था।

ट्रम्प और उनकी टीम ने राष्ट्रपति चुनाव के दौरान इसे बड़ा मुद्दा बनाया था। इन वोटों को अवैध मानते हुए ही ट्रम्प अपनी जीत का दावा भी कर रहे हैं। हालांकि हॉपकिंस ने मामले की जांच के दौरान सोमवार को अपने आरोपों को गलत बता दिया। इससे ट्रम्प और उनका दावा कमजोर हुआ है।

अमेरिका में कोई भी व्यक्ति दो बार राष्ट्रपति बन सकता है। वह चाहे लगातार हो या आगे-पीछे कभी। सूत्रों की मानें तो ट्रम्प इस संभावना पर भी काम कर हैं कि राष्ट्रपति पद से अगर वे हटते हैं तो उनके खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही न हो। उन्हें अच्छी तरह पता है कि उनकी बढ़ी हुई संपत्ति, कर चोरी, महिलाओं से अवैध संबंध, चुनाव प्रचार में वित्तीय कानूनों के उल्लंघन आदि के तमाम आरोप हैं।

भविष्य में इनकी जांच की जा सकती है। राष्ट्रपति पद से हटने के बाद वे संवैधानिक रूप से मिला कानूनी संरक्षण भी खो चुके होंगे। ऐसे में खुद को बचाने के लिए भी उन्हें पैसों की जरूरत पड़ सकती है। इसीलिए उनसे जुड़ी आशंकाएं पूरी तरह निराधार भी नहीं मानी जा रही हैं।

विदेश मंत्री पोम्पियो बोले- ट्रम्प दूसरे कार्यकाल की ओर बढ़ रहे

ट्रम्प ने फिर दावा किया, ‘जीतेंगे तो हम ही। हम बड़ी बढ़त पर हैं। लेकिन वे (बाइडेन) चुनाव छीनने की कोशिश कर रहे हैं। हम उन्हें ऐसा करने नहीं देंगे।’ दूसरी ओर, अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोम्पियो ने भी ट्रम्प का समर्थन किया। उन्होंने कहा, ‘सत्ता हस्तांतरण आसानी से हो जाएगा। लेकिन, राष्ट्रपति ट्रम्प दूसरे कार्यकाल की ओर बढ़ रहे हैं।’

सर्वे: 79% अमेरिकी चाहते हैं- ट्रम्प अब हार स्वीकार कर लें

अमेरिकी जनता मानने लगी है कि ट्रम्प को हार मान लेनी चाहिए। रॉयटर्स/इस्पसॉस के एक सर्वे में 79% लोगों ने कहा कि ट्रम्प को व्हाइट हाउस छोड़ देना चाहिए जबकि, 13% लोगों का कहना है कि अभी चुनाव में जीत-हार तय नहीं हुई है। 3% लोग ही यह मानते हैं कि जीत असल में ट्रम्प की हुई है। 5% लोगों ने कोई राय नहीं दी।



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Concerns former security officials, Trump may make secret notifications public; Can also sell


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Wednesday, November 4, 2020

87% अश्वेतों, 64% एशियाई लोगों ने बाइडेन को चुना, जीतने वाले सभी भारतीय डेमोक्रेट्स

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116 साल में पहली बार इलेक्शन डे पर अमेरिका को राष्ट्रपति नहीं मिल सका। काउंटिंग जारी है। कांटे के मुकाबले में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जो बाइडेन जीत की तरफ बढ़ रहे हैं। वे 227 इलेक्टोरल मत सुनिश्चित कर चुके हैं और 43 इलेक्टोरल वाले 4 राज्यों में आगे चल रहे हैं। वहीं, राष्ट्रपति ट्रम्प 213 इलेक्टोरल मत हासिल कर चुके हैं और 4 राज्यों में आगे चल रहे हैं, जहां 54 इलेक्टोरल वोट हैं।

व्हाइट हाउस पहुंचने के लिए 270 इलेक्टोरल मत की जरूरत है। इस तरह 2000 के बाद यह सबसे नजदीकी मुकाबला होता दिख रहा है। उस वक्त जॉर्ज डब्ल्यू बुश 271 इलेक्टोरल मत पाकर राष्ट्रपति बने थे। अब तक हुई मतगणना के मुताबिक ट्रम्प को 48.02% और बाइडेन को 50.1% वोट मिले हैं। हालांकि 4 स्विंग स्टेट्स पेन्सिलवेनिया, जॉर्जिया, विस्कॉन्सिन और नॉर्थ कैरोलिना में डाक द्वारा भेजे गए मतों की काउंटिंग रुकने से चुनाव प्रक्रिया में बाधा पहुंची है। इन राज्यों में डाक से भेजे गए 80 लाख मतों की गिनती से पहले ही ट्रम्प ने अपनी जीत का ऐलान कर दिया।

ट्रम्प ने कहा, कोर्ट जाएंगे, बाइडेन बोले- मुकाबला करेंगे

डाक द्वारा भेजे गए वोटों को धांधली बताते हुए ट्रम्प ने कोर्ट जाने की बात कही। ट्रम्प ने चुनाव में धांधली का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा- ‘समय खत्म होने के बाद वोटिंग जारी रखकर मतगणना में बड़े पैमाने पर धांधली हो रही है। यह अमेरिकी जनता से धोखा है। हम अब वोटिंग रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट जा रहे हैं। हम उन्हें सुबह 4 बजे तक किसी भी मतपत्र को खोजने और उन्हें सूची में शामिल नहीं करने देना चाहते, जहां तक मेरा सवाल है, हम पहले ही जीत चुके हैं।’ मतगणना के बीच बाइडेन और ट्रम्प के बीच सोशल मीडिया पर जुबानी जंग जारी रही।

उधर, बाइडेन ने कहा- ‘भरोसा रखिए, हम चुनाव जीतने जा रहे हैं।’ ट्रम्प ने दोपहर करीब 12 बजे लिखा- वह जीत का ऐलान करने वाले हैं। इस पर बाइडेन ने लिखा- विजेता के ऐलान का अधिकार मुझे या ट्रम्प को नहीं, बल्कि जनता को है। इसके बाद ट्रम्प ने डेमोक्रेट्स खेमे पर चुनावी धांधली के आरोप लगाने शुरू कर दिए।

पोस्ट पोल सर्वे : 64% युवा और 57% महिलाओं ने बाइडेन को वोट किया

वोटिंग के बाद हुए पोल के मुताबिक 64% युवाओं और 57% महिलाओं ने बाइडेन को वोट दिया। यहीं नहीं ट्रम्प की अप्रवासी नीति के विरोध में 87% अश्वेतों और 64% एशियाई मूल के लोगों ने बाइडेन को वोट देकर उनकी जीत की राह को आसान बना दिया है।

भारतीयों की आबादी वाले छह में से 5 राज्यों में बाइडेन की पार्टी को जीत मिली है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के लिए भारतीय मूल के चार उम्मीदवार डॉ. अमी बेरा, प्रमिला जयपाल, रो खन्ना और राजा कृष्णमूर्ति ने जीत हासिल की है। वहीं न्यूयॉर्क स्टेट असेंबली से मीरा नायर के बेटे जोहरान ने जीत हासिल की है।

4 अहम सवाल: राष्ट्रपति का रास्ता कैसे साफ होगा?

1. इलेक्शन नाइट पर अमेरिका को राष्ट्रपति क्यों नहीं मिल सका?

आठ राज्यों के नतीजे रुके हुए हैं। चार राज्यों में डाक से भेजे गए वोट गिनती में नहीं लाए गए। इस बार कोरोना की वजह से 6.5 करोड़ मेल इन वोट पड़े हैं, जो ज्यादातर बाइडेन के हैं। क्योंकि, पार्टी ने जल्दी वोटिंग के लिए चुनावी कैंपेन चलाया था। इन सभी वोटों की गिनती अभी पूरी नहीं हुई है।

2. क्या सभी राज्यों में नतीजे आने के बाद ही राष्ट्रपति तय होगा?

आधिकारिक तौर पर तो ऐसा ही होगा। लेकिन, अगर कोई नेता 270 का आंकड़ा पूरा कर लेता है तो उसे पहले ही विजेता घोषित किया जाता रहा है। हालांकि, उसके बाद भी मतगणना जारी रहती है, जो सिर्फ औपचारिकता है। लेकिन, इस बार ऐसा होता नहीं दिख रहा, क्योंकि टक्कर कांटे की है।

3. तो फिर नतीजा कब आएगा, शपथ तो 20 जनवरी को हो जाएगी न?

ट्रम्प ने डाक से आए मतों को फर्जी बताया है। मामला अब कोर्ट जाएगा। वहां चर्चा इस बात की होगी कि 3 तारीख के बाद डाक से प्राप्त होने वाले वोटों की गिनती होनी चाहिए या नहीं? कोर्ट में केस चलेगा तो फैसला आने तक चुनाव का नतीजा अटका रह सकता है। 20 जनवरी से पहले फैसला आ सकता है।

4. अगर चुनाव का परिणाम बराबर रहा तो फिर क्या होगा?

दोनों उम्मीदवारों को 269-269 वोट मिले, इसकी संभावना कम है। इस सूरत में प्रतिनिधिसभा नया अध्यक्ष चुनेगी। नए सदस्य राष्ट्रपति चुनेंगे। इसमें सभी 50 राज्य एक-एक वोट कर पाएंगे। अगर 25-25 पर टाई होता है तो तब तक दोबारा वोटिंग होती रहेगी, जब तक स्पष्ट नतीजा नहीं आ जाता।



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वोटिंग डे पर ट्रम्प और बाइडेन के बीच सोशल मीडिया पर जुबानी जंग भी जारी रही। दोनों ने एक दूसरे पर कई आरोप लगाए। (फाइल फोटो)


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Sunday, October 4, 2020

अमेरिका का नेता कैसा हो, जो बाइडेन जैसा हो, अबकी बार ट्रम्प सरकार जैसे नारे हिंदी में लग रहे

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अमेरिकी चुनाव में इस बार भारतीय और दक्षिण एशियाई वोटर्स को लुभाने के कोई मौके पॉलिटिकल पार्टियां नहीं छोड़ रही हैं। ‘अमेरिका का नेता कैसा हो, जो बाइडेन जैसा हो’, ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ जैसे हिंदी संबोधन इन दिनों अमेरिकी टीवी और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर देखने-सुनने को मिल रहे हैं।

ऐसा पहली बार है, जब दोनों पार्टियां भारतीयों को ध्यान में रखकर कैंपेन लॉन्च कर रही हैं। यहीं नहीं एक ओर जहां मौजूदा राष्ट्रपति और रिपब्लिकन पार्टी से उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रम्प प्रधानमंत्री मोदी से दोस्ती को भुनाने के लिए ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ कैंपेन चला रहे हैं, वहीं उनके प्रतिद्वंद्वी जो बाइडेन की टीम ने 14 भारतीय भाषाओं में रेडियो, टीवी पर कैंपेन ‘हिंदू अमेरिकंस फॉर बाइडेन’ कैंपेन लॉन्च किया है। इस कैंपेन के बाद ट्रम्प के रणनीतिकारों ने ‘हिंदू वोट्स फॉर ट्रम्प’ कैंपेन शुरू किया है।

हिंदू अमेरिका में चौथा सबसे बड़ा धर्म है

अमेरिका में हिंदी नारों की वजह यह है कि हिंदू अमेरिका में चौथा सबसे बड़ा धर्म है। देश की कुल जनसंख्या में इनकी भागीदारी 1% है। बाइडेन की टीम से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, भारत और एशियाई वोटरों से सीधा संपर्क बनाने के लिए स्थानीय भाषा का सहारा लिया गया है। बाइडेन की टीम के प्रमुख सदस्य अजय भतूरिया ने भास्कर से कहा कि इस कैंपेन के जरिए हम भारतीय वोटरों को दिखाना चाहते हैं कि हम उनकी परवाह ट्रम्प से ज्यादा करते हैं।

कैंपेन टीम ने यह भी वादा किया है कि अगर बाइडेन सत्ता में आते हैं तो न्याय विभाग में भारतीय अमेरिकियों की नियुक्ति करेंगे, जिससे भारतीयों के विरुद्ध हेट-क्राइम के मामलों में सही न्याय हो पाएगा।

मोदी से दोस्ती ट्रम्प के लिए फायदेमंद

कई सर्वे बताते हैं कि मोदी से दोस्ती चुनावों में ट्रम्प के लिए मददगार साबित हो रही है। ताजा सर्वे के मुताबिक 66% भारतीय अमेरिकी बाइडेन के पक्ष में हैं और 28% ट्रम्प की तरफ। इससे बाइडेन खेमे की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि 2016 में 77% ने हिलेरी और 16% ने ट्रम्प को वोट किया था।

2012 में 84% ने ओबामा के पक्ष में वोट किया था। 2016 में ट्रम्प के पक्ष में भारतीयों की वोटिंग ने फर्क डाला था। इस बार उन्हें इस वर्ग से दोगुना समर्थन मिलता दिख रहा है। हाल के दिनों में डोनाल्ड ट्रम्प कई बार कह चुके हैं कि भारतीय अमेरिकियों का उन्हें समर्थन मिला है, जिसके कारण उन्होंने कमला हैरिस को चुना है। बीते महीने व्हाइट हाउस में पत्रकारों से बात करते हुए उन्होंने कहा था- ‘मुझे पीएम मोदी और भारत का पूरा समर्थन है।

मुझे भरोसा है कि भारतीय अमेरिकी हमें ही वोट देंगे।’ टेनेसी राज्य के छट्टानूगा शहर में रेस्तरां मालिक विक्रम मल्होत्रा कहते हैं- ‘मैं इस चुनाव में बाइडेन के पक्ष में हूं। ट्रम्प खुद को मोदी का दोस्त जरूर बता रहे हैं, लेकिन उनकी नीतियां हम जैसे प्रवासियों के खिलाफ हैं।’ लेकिन लुइसविले में बिजनेसमैन रिक मेहता इससे इत्तेफाक नहीं रखते। वो कहते हैं कि ट्रम्प की पॉलिसी बिजनेस फ्रेंडली है और वे परिवारिक वैल्यू को महत्व देते हैं।

अमेरिका में एशियाई वोटर्स 50 लाख, कई जगह पर निर्णायक

  • अमेरिका में रह रहे भारतीय देश में दूसरे सबसे बड़े प्रवासी हैं, जिन्हें वोट देने की पात्रता है। 2011 के बाद दक्षिण एशियाई जनसंख्या में 43% की बढ़त हुई है, जो 2018 में बढ़कर 50 लाख से ज्यादा हो गई। इस दौरान 4.7% अमेरिकी बढ़े।
  • अमेरिका में 20 लाख भारतीय मूल के वोटर हैं। इनमें से 5 लाख वोटर एरिजोना, फ्लोरिडा, जॉर्जिया, मिशिगन, नॉर्थ कैरोलिना, पेंसिलवेनिया, टेक्सास और विस्कोन्सिन में रहते हैं। इन जगहों पर भारतीय निर्णायक हो सकते हैंं। 2016 में ट्रम्प ने मिशिगन 10 हजार से जीता था।
  • भारतीय वोटरों से प्रभावित सीटें कैलिफोर्निया, न्यूजर्सी और इलिनोइस, ह्यूस्टन के कुछ उपनगरों में हैं, जो ट्रम्प के लिए मुश्किल मानी जा रही हैं।

ट्रम्प की तरह 10 से ज्यादा राष्ट्रपति अपनी गंभीर बीमारी छिपा चुके हैं...

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प कोरोनावायरस से संक्रमित हो चुके हैं। पहले तो व्हाइट हाउस ने बताया कि उनमें संक्रमण के ‘आंशिक लक्षण’ हैं। लेकिन शुक्रवार शाम तक उन्हें भर्ती होना पड़ा। यहां राष्ट्रपतियों का बीमारी छिपाने का लंबा इतिहास है। पढ़ें रिपोर्ट...

ट्रम्प की ही तरह विल्सन ने भी संक्रमण की सूचना छिपाई थी

वुडरो विल्सन अप्रैल 1919 में पेरिस गए थे और बीमार पड़ गए। डॉक्टर कैरी ग्रैसन ने रात भर विल्सन की देखरेख के बाद वॉशिंगटन को बताया कि उनकी स्थिति गंभीर है। वे स्पेनिश फ्लू के शिकार थे, इससे अमेरिका में 6.75 जानें गई थीं।

रूजवेल्ट ने 1944 में अपनी बीमारी छिपाई, दूसरा टर्म पूरा नहीं कर पाए

फ्रेंकलिन डी रूजवेल्ट को 1944 में उच्च रक्तचाप और हृदय संबंधी बीमारियों का पता चला था। इसी बीच चुनाव आ रहा था तो व्हाइट हाउस ने कहा कि उनकी बीमारी गंभीर नहीं है। रूजवेल्ट चुनाव जीते लेकिन कुछ महीनों बाद निधन हो गया।

ग्रोवर ने आइलैंड में जाकर निजी जहाज में कराया था ऑपरेशन

राष्ट्रपति ग्रोवर क्लीवलैंड ने अपनी बीमारी को गुप्त रखते हुए एक निजी जहाज में मुंह का ऑपरेशन कराया था, जिसमें कैंसर वाले हिस्से को हटाया गया था। उन्हें डर था कि जनता को पता चला तो उन्हेें कमजोर राष्ट्रपति के तौर पर देखा जाएगा।

1841 में हेनरी ने बीमारी छिपाई और 9 दिन बाद मौत हो गई

1841 में विलियम हैरिसन निमोनिया से बीमार पड़े। लेकिन व्हाइट हाउस ने उनकी गंभीर बीमारी छिपाई। बीमार पड़ने के 9 दिन बाद उनकी मौत हो गई। उन्हें राष्ट्रपति पद की शपथ लिए हुए भी सिर्फ एक महीना ही बीता था।



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ताजा सर्वे के मुताबिक 66% भारतीय अमेरिकी बाइडेन के पक्ष में हैं और 28% ट्रम्प की तरफ।


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Monday, August 17, 2020

डेमोक्रेट से मुकाबले के लिए ट्रम्प डिजिटल प्रचार पर 4 दिन में 75 करोड़ खर्च करेंगे; जो बिडेन ने 1 हफ्ते में 111 करोड़ रुपए खर्च किए

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कोरोना संकट के कारण अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के लिए प्रचार के तरीके बदल गए हैं। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने डेमोक्रेटिक पार्टी के नेशनल कन्वेंशन को कड़ी टक्कर देने के लिए बड़ा डिजिटल अभियान चलाने की योजना बनाई है। यह कन्वेंशन चार दिन तक चलेगा। ट्रम्प के प्रवक्ता टिम मुर्तो ने कहा कि उनकी पार्टी इन चार दिनों में डिजिटल प्रचार पर 75 करोड़ रुपए खर्च करेगी। यू ट्यूब पर लगातार 96 घंटे भी प्रचार किया जाएगा। इसके अलावा कई बड़ी वेबसाइट और न्यूज आउटलेट्स पर कैंपेन चलाए जाएंगे।

डेमोक्रेटिक कैंडिडेट जो बिडेन टेलीविजन और रेडियो के जरिए प्रचार कर रहे हैं। एड ट्रैकिंग फर्म एडवरटाइजिंग एनालिटिक्स के मुताबिक, बिडेन ने 8 अगस्त से 14 अगस्त तक प्रचार पर 111 करोड़ और ट्रम्प ने 53 करोड़ रुपए खर्च किए। दोनों पार्टियां इस बार चुनाव प्रचार कार्यकर्ताओं की कमी से जूझ रही हैं। कई कार्यकर्ताओं ने वोटिंग के दिन भी काम करने से मना कर दिया है। अकेले मैरीलैंड राज्य में ही 14 हजार कार्यकर्ताओं की कमी है।

कोरोना के चलते कई कार्यक्रम रद्द

रैलियां, चंदा जुटाने के लिए सभाएं और चुनावी मुद्दों पर बहस जैसे कार्यक्रम लगभग रद्द किए जा चुके हैं। इस बार प्रत्यक्ष रैलियों, घर-घर पहुंचकर प्रचार जैसी गतिविधियों का स्थान डिजिटल माध्यम ने ले लिया है। पार्टियां वेबसाइट, यूट्यूब आदि पर विज्ञापन देकर प्रचार कर रही हैं। पहले राष्ट्रपति चुनाव को लेकर अगस्त के मध्य तक पार्टियों के कार्यकर्ता वोटरों के दरवाजों पर दस्तक दे चुके होते थे। इस साल ऐसा नहीं हुआ।

चुनाव में दोनों पार्टियों का नेशनल कन्वेंशन अहम होता है। यहीं पार्टियां उम्मीदवारों के नामांकन स्वीकार करती हैं। इस साल डेमोक्रेटिक पार्टी का नेशनल कन्वेंशन अप्रैल में होना था। इसे बढ़ाकर जुलाई और फिर 17 अगस्त करना पड़ा। पहले ट्रम्प कह रहे थे कि उनकी चुनावी रैलियों में ज्यादा से ज्यादा लोग पहुंचना चाहिए। इससे कोरोना का डर खत्म होने लगेगा, लेकिन ट्रम्प को फ्लोरिडा में कन्वेंशन रद्द करना पड़ा। वे चारलोट के कन्वेंशन में भी शामिल नहीं होंगे।

यहीं नहीं, ट्रम्प वॉशिंगटन डीसी के एंड्रयू मेलन ऑडिटोरियम में नॉमिनेशन स्वीकार करेंगे, लेकिन भाषण व्हाइट हाउस से ही देंगे। चारलोट कन्वेंशन में 400 पार्टी डेलिगेट्स हिस्सा लेंगे।

भारतीयता: डेमोक्रेट का कन्वेंशन मंत्र और अरदास के साथ शुरू हुआ
डेमोक्रेटिक पार्टी का चार दिवसीय नेशनल कन्वेंशन सोमवार से शुरू हुआ। इसके लिए देशभर में अलग-अलग जगह कार्यक्रम हो रहे हैं। पहले दिन टेक्सास में ऑनलाइन सर्वधर्म प्रार्थना सभा हुई। इसमें वेदों और महाभारत के श्लोक पढ़ गए। सिख धर्म की अरदास भी गई। टेक्सास में चिन्मय मिशन की एक अनुयाई ने मंत्रोच्चार किया। विस्कोंसिन गुरुद्वारे से जुड़े सिख समुदाय के एक नेता ने अरदास की।

इस सम्मेलन में बिडेन को डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से राष्ट्रपति और भारतीय मूल की सीनेटर कमला हैरिस को उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार चुना जाएगा। इससे पहले ‘बिडेन फॉर प्रेसीडेंट’ अभियान के लिए रविवार को भी सर्वधर्म प्रार्थना सभा हुई। इसमें बिडेन और हैरिस के लिए महाभारत की पंक्तियां पढ़ते हुए कहा गया- ‘यतो कृष्ण ततो धर्म, यतो धर्म ततो जय।' ट्रम्प और बिडेन के बीच पहली बहस 29 सितंबर को होनी है।



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ट्रम्प और बिडेन के बीच पहली बहस 29 सितंबर को होनी है। (फाइल फोटो)


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Friday, July 10, 2020

चुनावी सर्वे में पिछड़ने के बाद ट्रम्प ने खेला अप्रवासी विरोधी कार्ड, वर्क वीजा, एच-1बी जैसे फैसले से अश्वेतों को खुश करने की कवायद

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प चुनावी मूड में आ गए हैं। बीते माह के सर्वे और पोल में घटती लोकप्रियता के बाद ट्रम्प ने अपना अप्रवासी विरोधी कार्ड चल दिया है। इसी के दम पर वे सत्ता में पहुंचे थे। इस कड़ी में पहले ट्रम्प ने वर्क वीजा, एच-1बी वीजा और फिर ऑनलाइन क्लास लेने वाले छात्रों को देश छोड़ने का फरमान सुनाया है।

इस आदेश से एच-1बी वीजा के लिए आवेदन करने वाले 4 लाख से ज्यादा लोग प्रभावित होंगे। जानकार बताते हैं कि कई सर्वे और पोल बताते हैं कि ट्रम्प अपने अप्रवासी विरोधी आधार वोटरों के बीच लोकप्रियता खोते जा रहे हैं। साथ ही डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बिडेन से भी पिछड़ रहे हैं।

इसने ट्रम्प की कैंपेन टीम की बैचेनी बढ़ा दी है। ट्रम्प ने खुद व्यक्तिगत रूप से घटती लोकप्रियता को उस समय महसूस किया, जब तुलसा में उनकी चुनावी रैली फ्लॉप रही। उन्होंने सोशल मीडिया पर इस रैली में 10 लाख से ज्यादा लोगों के जुटने का दावा किया था।

लेकिन, उनकी प्रचार टीम के साथ कहासुनी हो गई, जब रैली में सिर्फ 6,200 लोग ही पहुंचे। न्यूजर्सी स्थित ड्रू यूनिवर्सिटी में राजनीति शास्त्र के असिस्टेंट प्रोफेसर संजय मिश्रा बताते हैं कि आईसीई आदेश विनाशकारी है और ट्रम्प के अप्रवासी विरोधी नजरिए को दर्शाता है।

बड़ी संख्या में छात्रों को देश छोड़ना पड़ेगा

ट्रम्प के इस आदेश ने छात्रों को अधर में डाल दिया है। बड़ी संख्या में छात्रों को देश छोड़ना पड़ेगा और जो देश के बाहर हैं, उनके सामने वीजा मिलने की अनिश्चिताएं बढ़ गई हैं। साथ ही ट्रम्प प्रशासन विश्वविद्यालयों पर अगस्त से स्कूल खोलने का दबाव डाल रहा है, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि हालात नॉर्मल हो रहे हैं।

हॉर्वर्ड समेत कई संस्थाएं कोरोना की वजह से सुरक्षा कारणों के चलते अगले शैक्षणिक साल में ऑनलाइन क्लास की घोषणा कर चुके हैं। इसलिए, छात्र असहाय हैं क्योंकि यह उनका निर्णय नहीं है। दूसरी तरफ हाॅर्वर्ड और मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) के नेतृत्व में एक दर्जन से अधिक विश्वविद्यालयों ने आदेश को रोकने के लिए अदालत का रुख किया है।

हाॅर्वर्ड यूनिवर्सिटी के प्रेसीडेंट लैरी बैको कहते हैं कि हमारा विश्वास है कि यह पॉलिसी बेहद खराब होने के साथ ही गैरकानूनी भी है। यह हाॅर्वर्ड जैसे कई संस्थाओं के सोचे-समझे नजरिए को नजरअंदाज करता है, जिसके तहत अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थी अपना अध्ययन स्वस्थ और सुरक्षित रहते हुए इस महामारी में जारी रख सकते हैं।

बैको कहते हैं कि हम इस मुद्दे को पूरी ताकत से बढ़ाते रहेंगे ताकि विदेशों से आए हमारे ही नहीं बल्कि देशभर की सारी संस्थाओं में डिपोर्ट से डरे बिना छात्र अपनी पढ़ाई जारी रख सकें। दिलचस्प है कि मैसाचुसेट्स राज्य ने ट्रम्प सरकार पर केस करने की अपनी योजना उजागर कर दी है और वे इस आदेश को क्रूर और गैरकानूनी मानते हैं।

कोलंबिया और बर्केले यूनिवर्सिटी ने हाइब्रिड मॉडल अपनाया है, जिसके तहत प्रत्यक्ष और ऑनलाइन दोनों ही माध्यम से पढ़ाई जारी रहेगी। ब्राउन यूनिवर्सिटी में 18% छात्र विदेशी हैं। उसने भी इस आदेश को क्रूर बताते हुए कहा कि यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा है।

वहीं, राष्ट्रपति ट्रम्प चाहते हैं कि सारे विश्वविद्यालय, स्कूल और कॉलेज अगस्त में खुल जाएं और उन्होंने धमकी दी है कि अगर ऐसा नहीं हुआ तो वे इन संस्थाओं में सरकारी अनुदान रोक देंगे। व्हाइट हाउस में एक कार्यक्रम में ट्रम्प ने कहा कि हम सारे गवर्नर और सारे संबंधित लोगों पर दबाव डालेंगे ताकि स्कूल जल्द से जल्द खुलें।

अमेरिकी इकोनॉमी में विदेशी छात्रों का योगदान 3 लाख करोड़ रु. का

द इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल एजुकेशन रिपोर्ट के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय छात्रों ने 2018 में अमेरिकी इकोनॉमी में 45 अरब डॉलर (करीब 3.3 लाख करोड़ रु.) का योगदान दिया। ग्लोबल एजुकेशन एडवोकेसी ग्रुप नाफ्सा के मुताबिक 2018-19 शैक्षणिक वर्ष में 4,60,000 नौकरियों में भी सहयोग दिया।



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ट्रम्प प्रशासन  विश्वविद्यालयों पर अगस्त से स्कूल खोलने का दबाव डाल रहा है, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि हालात नॉर्मल हो रहे हैं। -फाइल फोटो


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Monday, June 22, 2020

दुनिया में सबसे ज्यादा संक्रमित अमेरिका में मास्क का विरोध, जान से मारने की धमकी मिलने के बाद स्वास्थ्य अधिकारी नौकरी छोड़ रहे हैं

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कोरोना महामारी से दुनियाभर के 90 लाख संक्रमितों में से सबसे ज्यादा 23 लाख अमेरिका में है। फिर भी यहां कोरोना रोकथाम के उपायों के खिलाफ लाखों लोग उठ खड़े हुए हैं। वे न सिर्फ मास्क का विरोध कर रहे हैं, बल्कि सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों को भी नहीं मान रहे। अनिवार्य रूप से मास्क पहनने का आदेश जारी करने वाले स्वास्थ्य अधिकारियों को धमकी भी मिल रही हैं।

दक्षिण कैलिफोर्निया के ऑरेंज काउंटी मेंस्वास्थ्य अधिकारी डॉ. निकोल क्विक ने 10 जून को इसलिए इस्तीफा दे दिया क्योंकि उन्हें जान से मारने की धमकियां मिलीं। डॉ क्विक की गलती ये थी कि उन्होंने सार्वजनिक स्थानों पर लोगों के लिए मास्क पहनना अनिवार्य कर दिया था। कुछ घंटों बाद ही इसका विरोध शुरू हो गया। कुछ नाराज स्थानीय लोगों ने पोस्टर्स बनाए जिसमें उनकी तुलना हिटलर से की गई।

ये फोटोओकलाहोमा के टुल्सा की है। यहां ट्रम्प की रैली में शामिल होने आए लोग बिना मास्क के थे। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन भी नहीं किया।

धमकियां मिलने के बादडॉ. निकोल को सुरक्षा दी गई

ऑरेंज काउंटी के एक्जीक्यूटिव ऑफिसर फ्रैंक किम ने बताया कि सार्वजनिक मीटिंग और सोशल मीडिया पर लगातार मिल रही धमकियों के कारण उन्हें (डॉ क्विक को) सुरक्षा दी गई है। जनता में ये आक्रोश चौंकाने वाला है, क्योंकि इस क्षेत्र में 1.17 लाख लोग कोरोना महामारी के कारण मारे जा चुके हैं। जबकि 21 लाख पॉजिटिव पाए गए हैं। कैलिफोर्निया के ही सैंटा एना इलाके में मास्क समर्थकों के साथ धक्का-मुक्की की गई और नारे लगे- ‘हे हे हो हो मास्क को जाना होगा’।

पुलिस भी लगातार चेतावनी जारी कर रही

कैलिफोर्निया के स्वास्थ्य अधिकारियों के संगठन मेंएक्जीक्यूटिव डायरेक्टर कैट डेबुर्क ने भास्कर को बताया कि आम जनता में वैक्सीन को लेकर नाराजगी तो थी लेकिन इस कदर बढ़ जाएगी कि अधिकारियों को पुलिस सुरक्षा में घूमना पड़ेगा, ऐसा पहले कभी नहीं देखा गया।

सैन डिएगो में अधिकारियों को चेतावनी जारी करनी पड़ी क्योंकि कई जगहों पर लोग भीड़ में बिना मास्क पहने पार्टी कर रहे थे। न्यूयॉर्क और न्यूजर्सी जैसे राज्यों को छोड़ दें, तो बाकी सभी राज्यों में लोग न तो मास्क पहन रहे हैं, न ही जरूरी दूरी बनाकर रह रहे हैं। वहीं दक्षिण-पश्चिम मध्य राज्यों में बार और रेस्त्रां सुरक्षा नियम मानने को तैयार नहीं हैं। यही स्थिति शॉपिंग मॉल, थियेटर और समुद्र तटों पर भी है।

लोगों का मानना: ट्रम्प जिम्मेदार, जो खुद मास्क नहीं पहनते
लोगों का मानना है कि मास्क न पहनने की लापरवाही के पीछे अमेरिका के गैरजिम्मेदार नेतृत्व का हाथ है। ट्रम्प कई बार महामारी का मजाक उड़ा चुके हैं, वो खुद भी मास्क पहने नहीं दिखे। अब वे संक्रमित इलाकों में रैलियां कर रहे हैं। एक दिन पहले ओकलाहोमा के टुल्सा में रैली हुई, जहांं हफ्तेभर में कोरोना संक्रमितों और भर्ती मरीजों, दोनों की संख्या दोगुनी हो गई है।

रैली में 60 हजार लोग थे, ज्यादातर बिना मास्क के थे। रैली में ट्रम्प ने देश में कोरोना टेस्ट घटाने की बात कही, उन्होंने कहा कि इस संबंध में अधिकारियों को कहा गया है। ट्रम्प के इस बयान पर विशेषज्ञों ने आपत्ति जताई है। विशेषज्ञों का कहना है कि देश में संक्रमित वास्तव में बढ़ रहे हैं, राष्ट्रपति को इसकी चिंता होनी चाहिए।



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ट्रम्प कई बार महामारी का मजाक उड़ा चुके हैं, वो खुद भी मास्क पहने नहीं दिखे। अब वे संक्रमित इलाकों में रैलियां कर रहे हैं।


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Wednesday, May 27, 2020

सभी लीग बिना फैंस के शुरुआत की तैयारी में, 4 में से 3 अमेरिकी वैक्सीन बनने तक स्टेडियम जाकर मैच नहीं देखना चाहते

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दो महीने की नेशनल इमरजेंसी के दौरान पहली बार शनिवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प गोल्फ खेलते नजर आए। अमेरिका में कोरोनावायरस से मरने वाले लोगों का आंकड़ा एक लाख को पार कर गया है। इस दौरान अगर देश का राष्ट्रपति गोल्फ खेल रहा हो तो उसकी आलोचना होना लाजमी है।

ट्रम्प ने कहा, ‘हम खेल की वापसी चाहते हैं। देश में खेल शुरू हाेने की आवश्यकता है। हम इसके लिए काम भी शुरू कर चुके हैं। चाहते हैं कि खेल जैसा पहले था, वैसा हो जाए। 80-90 हजार की क्षमता वाले स्टेडियम में सिर्फ 15 हजार फैंस न हों।’

देश में अधिकतर खेल गतिविधियां मार्च से बंद हैं। हालांकि, मई से धीरे-धीरे कुछ गतिविधियां शुरू हो रही हैं। मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स (एमएमए) और नेसकार के इवेंट हो चुके हैं।

आर्टिफिशियल क्राउड से स्टेडियम भरने की योजना: स्पोर्ट्स इंडस्ट्री ऐसी किसी भी खेल गतिविधि को बढ़ावा नहीं दे रही, जिसमें भीड़ जुटे और फिजिकल डिस्टेंसिंग का उल्लंघन हो। टीमें, एसोसिएशन, लीग, ब्रॉडकास्टर, स्पॉन्सर का मुख्य फोकस बिना दर्शकों के खेल शुरू करवाना है।

फॉक्स नेटवर्क जैसे कई टीवी नेटवर्क बिना दर्शकों के लाइव टेलीकास्ट पर विचार कर रहे हैं। वे खाली सीटों को आर्टिफिशियल क्राउड से भरने की योजना पर काम कर रहे हैं। न्यू जर्सी की सेटन हाल यूनिवर्सिटी के हालिया सर्वेक्षण के अनुसार, अमेरिकी आने वाले समय में लाइव गेम टीवी पर देखना पसंद करेंगे।

मेजर लीग ने कहा- टूर्नामेंट के लिए कॉस्ट कटिंग जरूरी

ईएसपीएन के एनालिसिस के अनुसार, 7.5 लाख करोड़ रुपए की अमेरिकी स्पोर्ट्स इंडस्ट्री को खेल न होने से अब तक 90 हजार करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हो चुका है। ब्रॉडकास्टिंग रेवेन्यू के साथ-साथ खिलाड़ी, स्टेडियम और स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में काम करने वाले लोग सभी इससे प्रभावित हुए हैं।

कई मेजर लीग ने स्टाफ और खिलाड़ियों को सूचित कर दिया है कि आने वाले दिनों में अगर सरवाइव करना है और खेलों का आयोजन करना है तो कॉस्ट कटिंग करनी होगी।

एमएलएस और एनबीए के मुकाबले डिज्नी के कॉम्प्लेक्स में हो सकते हैं
बास्केटबॉल, बेसबॉल, फुटबॉल और अमेरिकन फुटबॉल की बड़ी लीग की योजना खेलों को बिना दर्शकों के आयोजित करने की है। मेजर लीग सॉकर (एमएलएस) ने फ्लोरिडा डिज्नी वर्ल्ड में मैच आयोजित करने का प्रस्ताव दिया है।

एनबीए की सभी 30 टीमें सीजन दोबारा शुरू करने को लेकर विचार कर रही हैं। लीग का बाकी सीजन ऑरलैंडो के डिज्नी वर्ल्ड में जुलाई के अंत में शुरू हो सकता है।

मेजर लीग सॉकर: 1200 से ज्यादा लोग 14 दिन तक क्वारेंटाइन रहेंगे
एमएलएस अगर डिज्नी स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में होती है तो खिलाड़ी, कोच, सपोर्ट स्टाफ के 1200 से ज्यादा लोगों को वाल्ट डिज्नी वर्ल्ड के पास बड़े रिजॉर्ट में 14 दिन के लिए क्वारेंटाइन में रहना होगा। खिलाड़ी परिवार को साथ नहीं ले जा सकेंगे।

खिलाड़ी ईएसपीएन के वाइड वर्ल्ड ऑफ स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स में प्रैक्टिस करेंगे। खिलाड़ी जून के मध्य में वहां पहुंच सकते हैं। खेल जुलाई में शुरू हो सकते हैं।

एनबीए: हेड कोच के लिए वर्कआउट सेशन प्रतिबंधित, ग्लव्स भी जरूरी
एनबीए 11 मार्च से स्थगित है। मई के पहले हफ्ते में घोषणा की गई थी कि एनबीए की टीमें जल्द ही प्रैक्टिस शुरू कर सकती हैं। खिलाड़ियों को एरिया को सैनिटाइज करना जरूरी है। सोशल डिस्टेंस मेंटेन करना होगा।

हेड कोच और पहली पंक्ति के असिस्टेंट के लिए वर्कआउट सेशन प्रतिबंधित है। हर टीम के साथ सिर्फ चार सदस्य हो सकते हैं। उनका भी मास्क और ग्लव्स पहनना अनिवार्य है।

अमेरिका की आधी आबादी का मानना है कि गेम बिना लाइव ऑडियंस के हों
ईएसपीएन के सर्वे के अनुसार, आधे से ज्यादा फैंस लाइव स्पोर्ट्स नहीं देख रहे। उन्होंने कहा है कि गेम बिना फैंस और लाइव ऑडियंस के होने चाहिए। फैंस को इस बात की भी चिंता है कि अगर वे स्टेडियम में गेम देखने जाएंगे तो वे संक्रमित हो सकते हैं।

सर्वे के अनुसार, चार में से तीन अमेरिकी तब तक स्टेडियम में मैच देखने नहीं जाना चाहते, जब तक कि वैक्सीन नहीं बन जाती।

अंपायरों को सबसे ज्यादा खतरा

सिर्फ खिलाड़ियों को ही रिस्क नहीं है। अंपायर, रेफरी, कोच, टीवी क्रू के सदस्यों को भी उतना ही खतरा है। अधिकतर अंपायरों की उम्र 50 साल से ज्यादा है और उन्हें रिस्क काफी ज्यादा है।



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देश में अधिकतर खेल गतिविधियां मार्च से बंद हैं। हालांकि, मई से धीरे-धीरे इसकी शुरुआत हो रही हैं। मिक्स्ड मार्शल आर्ट्स (एमएमए) और नेसकार के इवेंट हो चुके हैं।


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