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Saturday, October 24, 2020

चुनावी बहस में बेहद अहम मु्द्दों पर बात ही नहीं हुई, सीरिया में गृहयुद्ध और हॉन्गकॉन्ग में लोकतंत्र पर ट्रम्प-बाइडेन मौन

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अमेरिका में दो प्रेसिडेंशियल डिबेट हुईं। और दोनों में कुछ शब्दों या कहें कई शब्दों का न इस्तेमाल हुआ, न जिक्र। जैसे- सीरिया, ह्यूमन राइट्स, ड्रोन्स, डेमोक्रेसी गैरबराबरी, तानाशाही, इजराइल, फिलिस्तीन, मिडल ईस्ट, वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन, ग्वांतनामो बे, यूरोपियन यूनियन, ब्रिटेन, ब्रेक्जिट, फ्रांस, इटली, हॉन्गकॉन्ग, अफ्रीका, साउथ अमेरिका, टेरेरिज्म, मल्टीलेटरल यानी बहुपक्षीय और अलायंस। इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि अमेरिकियों का दिमाग कितना सिकुड़ रहा है।

अफगानिस्तान का जिक्र भी नहीं
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने अफगानिस्तान का जिक्र ही नहीं किया। एक ऐसा युद्ध प्रभावित देश जहां अमेरिका ने 2400 सैनिकों की जान गंवाई। और जहां 20 साल में अब तक 2 ट्रिलियन डॉलर खर्च हुए। हां, जो बाइडेन ने एक बार अफगानिस्तान का जिक्र जरूर किया। गौर से देखें तो यह अच्छा नहीं है। ट्रम्प तो हमेशा से खुद के प्रशंसक रहे हैं। वे पतझड़ को बसंत के नारंगी पत्तों के बीच छिपाने की कोशिश कर रहे हैं।

दोनों संभले नजर आए
इसमें कोई दो राय नहीं कि दूसरी डिबेट में ट्रम्प ने पहले के मुकाबले ज्यादा सभ्य व्यवहार किया। बाइडेन पोल्स में आगे चल रहे हैं। उन्होंने भी इसमें खुद को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया। कुल मिलाकर दोनों संतुलित नजर आए। कुछ देर के लिए चीन के उभार और रूस की अड़ियल रवैये को देखिए। तानाशाही फिर बढ़ रही है। लोकतंत्र कमजोर हो रहे हैं और अफ्रीका में जनसंख्या विस्फोट के हालात हैं। महामारी के दौरान ग्लोबल लीडरशिप की कमी साफ नजर आई। पश्चिमी देशों में असमानता के मामले बढ़ रहे हैं। कई और मामले हैं। इनके साथ ही सोशल मीडिया का जिक्र भी होना जरूरी है। इसके जरिए नफरत कई गुना बढ़ चुकी है। आने वाले दशक में इसका असर दिखाई देगा।

अमेरिका फर्स्ट की बात नहीं हुई
सवाल यह है कि डिबेट्स के दौरान हमें क्या थीम दिखी या सुनाई दी। शायद कोई नहीं। टीवी पर एनालिसिस कर रहे लोगों ने नोट किया कि बाइडेन अपनी घड़ी की तरफ देख रहे थे। टीवी कैमरा की तरफ सीधे देखने से गुरेज कर रहे थे। ट्रम्प ने हंटर बाइडेन के मुद्दे पर डेमोक्रेट कैंडिडेट को घेरने की कोशिश की। ट्रम्प ने अमेरिका फर्स्ट की बात नहीं की।

इन मुद्दों का जिक्र तो होना चाहिए था
सीरिया में जारी सिविल वॉर में चार लाख लोग मारे जा चुके हैं। बचे हुए लोगों में से 80 फीसदी गरीबी में जी रहे हैं। 40 फीसदी बेरोजगार हैं। हॉन्गकॉन्ग और बेलारूस। यहां साहसी और जुझारू प्रदर्शनकारी लोकतंत्र के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्हें अमेरिका से समर्थन की उम्मीद है। वे आशा भरी नजरों से हमारी तरफ देख रहे हैं। मिडिल ईस्ट। इजराइल और फिलिस्तीन। जहां अमेरिकी डिप्लोमैसी के जरिए अमन बहाली की कोशिश हो रही है। यहां अमेरिकी फंड्स और लोग जुटे हुए हैं। इराक में कई अमेरिकी और वहां के स्थानीय लोग जान गंवा चुके हैं। इनका जिक्र होना चाहिए था।

फिर क्या हुआ
अमेरिकी दिमाग सिकुड़ रहे हैं और इसकी झलक व्हाइट हाउस से उठ रही आवाजों से मिलती है। सम्मान की बात नहीं होती। वहां से बस कहा जाता है। सच्चाई के लिए, साइंस के लिए कोई सम्मान नहीं है। फिर ये कैसी डिबेट थी। 70 साल से ज्यादा के दो व्यक्ति दुनिया को यह भरोसा नहीं दिला सके कि वे दुनिया की विचारधारा और आदर्शवाद में बदलाव की मदद करेंगे। यह बुनियादी रूप से बेइजज्जती या सम्मान न देने जैसा मामला है। दोनों कैंडिडेट्स के बीच जो बातें हुईं, उनके बारे में पहले से अनुमान था।

अमेरिकी समाज की झलक दिखी
डिबेट में अमेरिकी सोसायटी की झलक दिखी। ये समझ आया कि रचनात्मक विचार-विमर्श लगभग असंभव है। ट्रम्प ने हिंसा और बंटवारे के जरिए शासन किया। आम सहमित और लोगों तक पहुंचने की कोशिश नहीं की। नतीजा ये हुआ कि बहस भी आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित हो गई। मानवाधिकार हमेशा अमेरिका में मुद्दा और मिशन रहा। गैरबराबरी बढ़ रही है, इससे सामाजिक तानाबाना टूट रहा है। नाइंसाफी के आरोप लग रहे हैं। अमेरिकी सैनिक खतरों का सामना कर रहे हैं। अमेरिका को बनाने में उसके इतिहास, इमीग्रेशन और खुलेपन का भी योगदान है। ट्रम्प के दौर में हमारा सोच सीमित हुआ। यह खतरनाक है। अगर उन्हें चार साल और मिल गए तो अमेरिकी आईडिया खतरे में पड़ जाएगा। और आखिर में शायद इस डिबेट से सिर्फ ये पता लगता है कि हम कितने पीछे जा चुके हैं।



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Sunday, September 20, 2020

डोनाल्ड ट्रम्प जिसे मिडिल-ईस्ट के लिए नई सुबह बता रहे हैं, वह अरब देशों में बिखराव की वजह भी बन सकती है

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यूएई और बहरीन इजराइल के साथ डिप्लोमैटिक रिलेशन बना चुके हैं। अब अगर यह अनुमान लगाया जाए कि अक्टूबर में सऊदी अरब के शासन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान (एमबीएस) भी ऐसा ही करेंगे तो कुछ गलत नहीं होगा। इसमें कोई शक नहीं कि सऊदी अरब मिडिल ईस्ट की सबसे बड़ी ताकत है। और उसकी मर्जी के बिना यूएई और बहरीन इजराइल से समझौता नहीं कर सकते थे। दोनों देशों में राजशाही है। अब अगर सऊदी अरब भी इजराइल के साथ रिश्ते बना लेता है तो यह मध्य पूर्व में विघटन ही कहा जाएगा।

अमेरिकी राष्ट्रपति पहले ही कह चुके हैं कि कुछ महीनों में पांच या छह अरब देश और इजराइल के साथ दोस्ताना रिश्तों की शुरुआत करेंगे। ट्रम्प इसे मिडिल ईस्ट में नई सुबह और विश्व शांति में एक नए दौर की शुरुआत बताते हैं।

पिता की सहमति का इंतजार
प्रिंस सलमान को दुनिया में एमबीएस के नाम से जाना जाता है। एमबीएस कोशिश कर रहे हैं कि पिता सलमान इजराइल से संबंध स्थापित करने के लिए राजी हो जाएं। वो उन्हें बता रहे हैं कि दुनिया कितनी बदल चुकी है। एमबीएस बताते होंगे कि डेमोक्रेटिक दौर में पत्रकार जमाल खशोगी कितना बड़ा खतरा बन गए थे और यमन कैसे हमलावर हो गया था। लेकिन, क्या ये बातें इतनी आसान हैं। यूएई और बहरीन को जनता की नाराजगी की फिक्र शायद ज्यादा नहीं है। लेकिन, सऊदी के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। यह दुनिया के 1 अरब 80 करोड़ मुस्लिमों से जुड़ा मामला हो जाता है।

ये इतना आसान नहीं
सऊदी के पॉलिटिकल एनालिस्ट अली शिहाबी कहते हैं- अगर एमबीएस इजराइल मामले में आगे बढ़ते हैं तो देश के परंपरावादी, जिहादी और ईरान इसे नहीं मानेगा। 2002 में अरब देशों ने फिलिस्तीन के मुद्दे पर नजरिया साफ कर दिया था। इजराइल से सामान्य रिश्ते रखना आसान नहीं होगा। कई बातों पर विचार करना होगा। व्हाइट हाउस में इजराइल और यूएई के अलावा बहरीन के नेताओं की जो सेरेमनी हुई, उसे फिलिस्तीन के नजरिए से नहीं देखा गया। दरअसल, अरब देशों के लिए समस्या उनके घर में ही है। कॉम्पटीशन है नहीं, टॉर्चर और करप्शन आम बातें हैं।

तो क्या ये ट्रम्प का ड्रामा है
अरब इजराइल संबंधों के लिए डोनाल्ड ट्रम्प और जेरेड कुशनर और इजराइल में अमेरिकी एम्बेसेडर डेविड फ्रेडमैन ने जमीन तैयार की। डेविड कहते हैं- इजिप्ट और जॉर्डन के बाद अगर दो और देश इजराइल से सामान्य संबंध बनाते हैं तो क्या गलत है। यहूदी और अरब जितना करीब आएंगे उतना बेहतर है। ये भी बहुत अच्छा संकेत है कि वेस्ट बैंक को इजराइल में मिलाने की योजना बेंजामिन नेतन्याहू ने रद्द कर दी। उन्होंने इस बात पर भी जोर नहीं दिया कि बहरीन और यूएई इजराइल को यहूदी राष्ट्र के रूप में मान्यता दें।

ट्रम्प की इतिहास में रुचि नहीं
यूएई या बहरीन से इजराइल को कभी दिक्कत नहीं रही। सवाल तो फिलिस्तीन का है। ट्रम्प और कुशनर इस बात को समझने तैयार नहीं हैं। फिलिस्तीन की समस्या को उन्होंने मजाक बना दिया है। वहां की लड़ाई ऐतिहासिक है और ट्रम्प प्रशासन को इतिहास की समझ नहीं है। लिहाजा, फिलिस्तीन कभी ट्रम्प की इन कोशिशों को स्वीकार नहीं करेगा। दरअसल, यह 65 लाख फिलिस्तीन लोगों का मामला है, जो गाजा के अलावा वेस्ट बैंक और इजराइल में रहते हैं। वर्तमान हालात से हल नहीं निकलेगा, कुछ देर मामला टल जाएगा। ये नई सुबह तो बिल्कुल नहीं होगी, जैसा दावा ट्रम्प करते हैं।

क्या जवाब देंगे ट्रम्प
फिलिस्तीनी नेता मोहम्मद अब्बास ताश के पत्तों से बने महल में बैठे हैं। एक दिन ये ढह जाएगा। अब्राहम लिंकन ने कहा था- हम साइसं, आर्ट और मेडिसिन को सपोर्ट करेंगे। हर शख्स से धैर्य और सम्मान की उम्मीद करते हैं। फिर चाहे वो किसी भी नस्ल, मजहब और संप्रदाय का हो। ऐसे अमेरिकी राष्ट्रपति से जो खुद साइंस और मेडिसिन का मजाक उड़ाता हो, और नस्लवाद और सांप्रदायिकता में यकीन रखता हो- जवाब की उम्मीद करना बेमानी है। दरअसल, ट्रम्प नामुमकिन चीजों के बारे में सोचने वाले हैं। नई सुबह के बारे में वे नहीं सोचते। अगर सऊदी-इजराइल डील होती है तो अक्टूबर में ईरान और अमेरिका के बीच सैन्य टकराव की आशंका बढ़ जाएगी।



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Donald Trump Israel Saudi Arabia | US President Donald Trump and Middle East Israel deal next Prince Saudi Arabia on Cards with Mohammed bin Salman.


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